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ग़ज़ल
बहज़ाद लखनवी
ग़ज़ल
किसी को देना ये मशवरा कि वो दुख बिछड़ने का भूल जाए
और ऐसे लम्हे में अपने आँसू छुपा के रखना कमाल ये है
मुबारक सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
समझ में कुछ नहीं आता समुंदर जब बुलाता है
किसी साहिल का कोई मशवरा अच्छा नहीं लगता