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ग़ज़ल
मंज़ूर दोस्ती जो तुम्हें है हर एक से
अच्छा तो क्या मुज़ाएक़ा 'इंशा' से कीं सही
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
ग़ज़ल
लगे कहने आब माया तुझे हम कहा करेंगे
कहीं उन के घर से बढ़ कर जो फिरा ग़ुलाम उल्टा
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
ग़ज़ल
जो कल तक घर था बेटी का हुआ है माएका अब वो
ज़रा सी रस्म से ही आशियाना छूट जाता है
अन्जुमन मंसूरी आरज़ू
ग़ज़ल
मौक़ूफ़ कब है जिन्न-ओ-इंस-ओ-मलाइका पर
ताइर भी नाम लेते हैं सुब्ह-ओ-शाम तेरा
अनीसा हारून शिरवानिया
ग़ज़ल
क्या कीजे चुन के माएदा-ए-दिल को लख़्त लख़्त
तेरा ही तीर सीने में जब मेहमाँ न हो
मौलाना मोहम्मद अली जौहर
ग़ज़ल
यही तुझ से अपना था वास्ता यही थी हयात-ए-मुआ'शक़ा
तिरी ख़ल्वतों के शरीक थे तिरी अंजुमन से चले गए
शाज़ तमकनत
ग़ज़ल
गर फ़िल-मसल मलाइका हों अहल-ए-ज़ोहद सब
ले आवे बहर-ए-सैर उन्हें मू-कशाँ बसंत