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ग़ज़ल
मेरी चुप रहने की आदत जिस कारन बद-नाम हुई
अब वो हिकायत आम हुई है सुनता जा शरमाता जा
हफ़ीज़ जालंधरी
ग़ज़ल
ज़िंदगी नज़्र गुज़ारी तो मिली चादर-ए-ख़ाक
इस से कम पर तो ये नेमत नहीं मिलने वाली
इफ़्तिख़ार आरिफ़
ग़ज़ल
अज़िय्यतों में भी बख़्शी मुझे वो ने'मत-ए-सब्र
कि मेरे दिल में गिरह है न मेरे माथे पे बल
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
नेमत-ए-ग़म मेरा हिस्सा मुझ को दे दे ऐ ख़ुदा
जम'अ रख मेरी ख़ुशी सारे ज़माने के लिए
हफ़ीज़ जालंधरी
ग़ज़ल
ख़ुदा ने मुझ को बिन-माँगे ये नेमत दी है 'मंज़र'
तरसते हैं बहुत से लोग ममता देखने को
मंज़र भोपाली
ग़ज़ल
गिर्या-ए-नीम-शबी की ने'मत जब से बहाल हुई
हर लहज़ा उम्मीद-ए-हुज़ूरी बढ़ती जाती है