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ग़ज़ल
सुर्ख़ी में नहीं दस्त-ए-हिना-बस्ता भी कुछ कम
पर शोख़ी-ए-ख़ून-ए-शोहदा मेरे लिए है
मौलाना मोहम्मद अली जौहर
ग़ज़ल
अश्क-ए-गुलगूँ को न ख़ून-ए-शोहदा को देखा
शोख़ जैसा कि तिरे रंग-ए-हिना को देखा
मिर्ज़ा मायल देहलवी
ग़ज़ल
कू-ए-क़ातिल में है ख़ूनी कफ़नों का मजमा
एँडते फिरते हैं क्या क्या शोहदा एक से एक
शाह अकबर दानापुरी
ग़ज़ल
अर्सा-ए-हश्र तक इक लग गया ताँता उन का
मुर्दे क़ब्रों से जो तेरे शोहदा के उट्ठे