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ग़ज़ल
बहुत देखा है तुम ने हुस्न-ए-सन्नाई मगर उस को
जो देखो तो कहोगे वाह-वा बरजस्तगी है ये
मोहम्मद आज़म
ग़ज़ल
मेरे हक़ में तो हर-इक मौसम ख़िज़ाँ-आसार था
किस की सन्नाई ने गुल-मंज़र सजाया हर-तरफ़
हामिद इक़बाल सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
रहीं आँखें न दिल अब और न सन्ना’ई मगर देखो
कि ख़ाली हो के मैं ने उस को किस ख़ूबी से भर डाला