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ग़ज़ल
वो ख़ुल्क़ से पेश आते हैं जो फ़ैज़-रसाँ हैं
हैं शाख़-ए-समर-दार में गुल पहले समर से
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
ग़ज़ल
बहुत ख़ुश-ख़ुल्क़ था मैं भी मगर ये बात जब की है
न औरों ही से वाक़िफ़ था न ख़ुद को जानता था मैं
अनवर शऊर
ग़ज़ल
क्यूँ कुश्त-ए-ए'तिबार भी सरसर की ज़द में हो
क्या इंतिज़ार-ए-ख़ुल्क़ से फ़स्ल-ए-हुनर कटे
अता शाद
ग़ज़ल
तस्कीन-ए-ख़ुल्क़-ए-साक़ी को पीता हूँ मैं शराब
मेरी नज़र में साक़ी है पैमाना तो नहीं
अब्दुल मलिक सोज़
ग़ज़ल
नाजिर अल हुसैनी
ग़ज़ल
ख़ुल्क़ हिम्मत और मुरव्वत हैं शरफ़ इंसान के
वो कभी इंसाँ नहीं है जिस में ये हालत नहीं
जमीला ख़ुदा बख़्श
ग़ज़ल
ख़ुलूस-ओ-ख़ुल्क़-ओ-मोहब्बत की चाह पैदा कर
मगर न इस में कभी इश्तिबाह पैदा कर
हैदर हुसैन फ़िज़ा लखनवी
ग़ज़ल
दिरहम मिला भी मुनइ'म-ए-कज-ख़ुल्क़ से अगर
इक दाग़ बन के वो कफ़-ए-साइल में रह गया