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ग़ज़ल
धोऊँ सद-आब-ए-तेग़ से ऐ पम्बा जो कभू
दामन से तेरे दामन दाग़-ए-जिगर मिले
मुफ़्ती सदरुद्दीन आज़ुर्दा
ग़ज़ल
तिश्ना-ए-ख़ूँ है अपना कितना 'मीर' भी नादाँ तल्ख़ी-कश
दम-दार आब-ए-तेग़ को उस के आब-ए-गवारा जाने है
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
ग़ुबार-ए-दिल को आब-ए-तेग़ से उस के मिला कर मैं
नए सर से इमारत दिल की फिर बुनियाद करता हूँ
मीर हसन
ग़ज़ल
इस क़दर मज़बूत मौसम पर रही किस की गिरफ़्त
मैं कि मुझ से सीना-ए-आब-ओ-हवा रौशन हुआ
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
कुछ तो कर दरिया मिरे इन को डुबो या पार कर
कश्तियों ने अपना दुख आब-ए-रवाँ पर लिख दिया
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
तेग़ का फल खाया आब-ए-तेग़ पी कर सो रहे
कसरत-ए-आब-ओ-ग़िज़ा से वाक़ई आती है नींद