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ग़ज़ल
मिली है सरपरस्ती आलिमों की याँ मुझे जब से
हमेशा इल्म पा कर फूलता-फलता रहा हूँ मैं
रितेश सिंह 'राहिल'
ग़ज़ल
'जमीला' आलिमों से साफ़ कह दे तुझ को डर किस का
मकान-ए-दिल मक़ाम-ए-किबरिया है ला-मकाँ कैसा
जमीला ख़ुदा बख़्श
ग़ज़ल
फला-फूला रहे या-रब चमन मेरी उमीदों का
जिगर का ख़ून दे दे कर ये बूटे मैं ने पाले हैं
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
ग़ाफ़िलों के लुत्फ़ को काफ़ी है दुनियावी ख़ुशी
आक़िलों को बे-ग़म-ए-उक़्बा मज़ा मिलता नहीं