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ग़ज़ल
आरज़ूओं का शबाब और मर्ग-ए-हसरत हाए हाए
जब बहार आए गुलिस्ताँ में तो मुरझाता हूँ मैं
आग़ा हश्र काश्मीरी
ग़ज़ल
हसन रिज़वी
ग़ज़ल
तिरे दीद से ऐ सनम चमन आरज़ुओं का महक उठा
तिरे हुस्न की जो हवा चली तो जुनूँ का रंग निखर गया
फ़ना बुलंदशहरी
ग़ज़ल
ज़ब्त भी होता है अंदाज़-ए-जुनूँ में शामिल
आरज़ू शोला-ब-जाँ हो ये ज़रूरी तो नहीं
साहिर होशियारपुरी
ग़ज़ल
तमन्नाओं को ज़िंदा आरज़ूओं को जवाँ कर लूँ
ये शर्मीली नज़र कह दे तो कुछ गुस्ताख़ियाँ कर लूँ