aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "aks-e-shabaab"
आईना-ए-निगाह में अक्स-ए-शबाब हैदुनिया समझ रही है कि आँखों में ख़्वाब है
दे के इक बोसा अजब नाज़ से दिलबर ने कहाऐ 'शबाब' आज ये तुझ पर है इनायत मेरी
ग़म-ए-इश्क़ की सुनी दास्ताँ तो कलेजा थाम के यार नेये कहा कि क़िस्सा अजीब था मिरे दिल को उस ने कुढ़ा दिया
'शबाब' इस बे-ख़ुदी में मश्ग़ला है बस यही बाक़ीमियान-ए-कूचा-ए-दिलदार उठना बैठना चलना
आशिक़ की जान जाती है इस बाँकपन को छोड़ऐ बुत ख़ुदा के वास्ते अपने चलन को छोड़
हम ऐ 'शबाब' ऐसे मुक़द्दर का क्या करेंख़्वाबीदा जो नहीं है तो बेदार भी नहीं
जुदाई दे गए सदियों की तुम तो जान-ए-'शबाब'जनम गुज़र गए कितने तुम्हें पुकारे हुए
आओ अपनाएँ मुरव्वत दोस्ती उन्स-ओ-वफ़ाआओ भर लें ज़िंदगी में रंग रस ख़ुशबू मिठास
उस को ये ज़ो'म था कि है वो शौकत-ए-चमनजंगल का एक फूल उसे मात दे गया
नई रुतों की हवा ले उड़ी लिबास उस कावो कल तलक तो हरीम-ए-हया में बैठा था
हमारा ज़र्फ़ ही कम पड़ गया वगर्ना 'शबाब'मय-ए-करम तो उन आँखों ने कुछ उँड़ेली थी
नज़र झुका के मिरे ज़िक्र पर सर-ए-महफ़िलतुम एक बार मोहब्बत का ए'तिराफ़ करो
दुश्मन पे 'शबाब' अपने क्यों मुझ को न रहम आएगाली मुझे दुश्मन की लगती है दुआ हो कर
ऐ 'अक्स' खिड़कियों को खुला छोड़ दे ज़राकमरे के बंद घेरों से घबरा गया चराग़
माना कि तू ज़ालिम के बराबर नहीं ऐ 'अक्स'ऊँचाई पे लेकिन मिरा परचम तो हुआ है
'अक्स' रब का ये एहसान हम पर हुआताइर-ए-फ़िक्र हम भी उड़ाने लगे
उन को ये चाहिए इक दम न भुलाएँ हम कोरफ़्ता रफ़्ता दिल-ए-शैदा से हटाएँ हम को
ये तेरी ग़ज़लें बयाँ नहीं हैं विसाल-ए-शब की नवाज़िशों काजो हो सके मसनवी में सारा वो अक्स-ए-कैफ़-ए-शबाब लिखना
टूटा तअल्लुक़ात का आईना इस तरहअक्स-ए-नशात-ए-लम्हा-ए-फ़ानी भी ले गया
मुत्तसिल तिफ़्ली से आग़ाज़-ए-शबाबख़्वाब के आग़ोश में बेदारियाँ
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