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ग़ज़ल
अकबर इलाहाबादी
ग़ज़ल
अक़ीदे बुझ रहे हैं शम-ए-जाँ ग़ुल होती जाती है
मगर ज़ौक़-ए-जुनूँ की शोला-सामानी नहीं जाती
अली सरदार जाफ़री
ग़ज़ल
अक़ीदे बुझ रहे हैं शम-ए-जाँ गुल होती जाती है
मगर ज़ौक़-ए-जुनूँ की शो'ला-सामानी नहीं जाती
अली सरदार जाफ़री
ग़ज़ल
वो हुक्म कि है अक़्ल-ओ-अक़ीदे पे मुक़द्दम
छुटने ही नहीं देता मुक़द्दर का अंधेरा
आफ़ताब इक़बाल शमीम
ग़ज़ल
कल झूम के बोली केंचुलि-ए-इल्हाद अक़ीदे के मन से
ऐ रिंद तुझे दो मूँहों ने क्या जाम पिलाया होता है
फ़ैसल अज़ीम
ग़ज़ल
इस ‘अक़ीदे ने लिया क़ैसर-ओ-किसरा से ख़िराज
मौत का वक़्त अज़ल से है मुक़र्रर देखो