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ग़ज़ल
असीरान-ए-क़फ़स सेहन-ए-चमन को याद करते हैं
भला बुलबुल पे यूँ भी ज़ुल्म ऐ सय्याद करते हैं
भारतेंदु हरिश्चंद्र
ग़ज़ल
असीरान-ए-क़फ़स ऐसा तो हो तर्ज़-ए-फ़ुग़ाँ अपना
कि हो सय्याद ख़ुद भी रफ़्ता रफ़्ता हम-ज़बाँ अपना
आसी रामनगरी
ग़ज़ल
बुलबुलों का पूछना घबरा के ये सय्याद से
हम असीरान-ए-क़फ़स होंगे कभी आज़ाद भी
फ़हीमुद्दीन अहमद फ़हीम
ग़ज़ल
ज़ुल्म-ए-सय्याद सहा जाए यकायक क्यूँकर
हम असीरान-ए-क़फ़स ताज़ा गिरफ़्तार हैं सब
असद अली ख़ान क़लक़
ग़ज़ल
मैं तड़पता हूँ तो कहते हैं असीरान-ए-क़फ़स
ज़ख़्म-ख़ुर्दा हम गिरफ़्तारों में बिस्मिल एक है
इमदाद अली बहर
ग़ज़ल
थी असीरान-ए-क़फ़स को आरज़ू परवाज़ की
खुल गई खिड़की क़फ़स की क्या कि क़िस्मत खुल गई