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ग़ज़ल
ज़िंदगी के नर्म काँधों पर लिए फिरते हैं हम
ग़म का जो बार-ए-गिराँ इनआम ले कर आए हैं
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
ये दम-ए-सर्द है किस का कि हर इक नख़्ल-ब-बाग़
याद-ए-बे-बरगी-ए-अय्याम-ए-ख़िज़ाँ देता है
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
याद-ए-अय्याम-गुज़िश्ता में न तड़पूँ क्यूँकर
कि अभी तक मिरे बिस्तर में तुम्हारी लौ है
रशीद लखनवी
ग़ज़ल
क्यों नसीहत में तिरी नासेह हैं ये दिल-सोज़ियाँ
क्या तिरे दिल पर गुज़रते हैं मिरे आलाम-ए-इश्क़