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ग़ज़ल
अब ज़बाँ भी दे अदा-ए-शुक्र के क़ाबिल मुझे
दर्द बख़्शा है अगर तू ने बजाए-दिल मुझे
जिगर मुरादाबादी
ग़ज़ल
बजाए दाना ख़िर्मन यक-बयाबाँ बैज़ा-ए-कुमरी
मिरा हासिल वो नुस्ख़ा है कि जिस से ख़ाक पैदा हो
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
रग-ए-लैला को ख़ाक-ए-दश्त-ए-मजनूँ रेशगी बख़्शे
अगर बोवे बजा-ए-दाना दहक़ाँ नोक निश्तर की
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
'रसा' हाजत नहीं कुछ रौशनी की कुंज-ए-मरक़द में
बजाए-शम्अ याँ दाग़-ए-जिगर हर वक़्त जलते हैं