aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "beshii"
तवज्जोह में कमी बेशी न जानोअज़ीज़ो! मैं अकेला आदमी हूँ
वो शय कुछ और है कहते हैं जान-ए-पाक जिसेये रंग ओ नम ये लहू आब ओ नाँ की है बेशी
भाव-ताव में कमी बेशी नहीं हो सकतीहाँ मगर तुझ से ख़रीदार को नाँ कैसे हो
बराबर में कमी बेशी को रख करतरक़्क़ी का इरादा कर रहा है
हो गई हर एक बेशी में कमीजब ख़याल-ए-बेश-ओ-कम पैदा हुआ
अब कमी बेशी का रोना किस लिएजो मुक़द्दर में लिखा था मिल गया
सब परखने को है कमी-बेशीसब उसी का मिरे तुम्हारे में
बराबरी के लिए चाहिए कमी-बेशीमकान ऊँचा बनाओ ज़मीं अगर कम है
बात है शोहरा-नसीबी की निराली वर्नामुझ पे किस चीज़ में मजनूँ के तईं बेशी है
हम समझते हैं कमी-बेशी तवज्जोह की तिरीकौन है दर्द बढ़ाता है घटा देता है
रफ़्तार के लिए कमी-बेशी ज़रूर हैलेकिन ये क्या कि वक़्त की रफ़्तार कम नहीं
यक नज़र बेश नहीं फ़ुर्सत-ए-हस्ती ग़ाफ़िलगर्मी-ए-बज़्म है इक रक़्स-ए-शरर होते तक
तक़ाज़े क्यूँ करूँ पैहम न साक़ीकिसे याँ फ़िक्र-ए-बेश-ओ-कम नहीं है
शेर मर्दों से हुआ बेश-ए-तहक़ीक़ तहीरह गए सूफ़ी ओ मुल्ला के ग़ुलाम ऐ साक़ी
टूट पड़ता है दफ़अ'तन जो इश्क़बेश-तर देर-पा नहीं होता
दिल कि यक क़तरा ख़ूँ नहीं है बेशएक आलम के सर बला लाया
अब भी कुछ लोगो ने बेची है न अपनी आत्माये पतन का सिलसिला कुछ और चलना चाहिए
वक़्त दम भर का खेल है इस मेंबेश-अज़-बेश है कम-अज़-कम जी
न रखा हम ने बेश-ओ-कम का ख़यालशौक़ को बे-हिसाब ही लिक्खा
रहे हिर्स-ओ-हवा दाइम 'अज़ीज़ो साथ जब अपनेन क्यूँकर फ़िक्र-ए-बेश-ओ-कम हमें भी हो तुम्हें भी हो
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