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ग़ज़ल
शब बीती चाँद भी डूब चला ज़ंजीर पड़ी दरवाज़े में
क्यूँ देर गए घर आए हो सजनी से करोगे बहाना क्या
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
जिस धूप की दिल में ठंडक थी वो धूप उसी के साथ गई
इन जलती बलती गलियों में अब ख़ाक उड़ाऊँ किस के लिए
नासिर काज़मी
ग़ज़ल
अपनी बीती कैसे सुनाएँ मद-मस्ती की बातें हैं
'मीरा-जी' का जीवन बीता पास के इक मय-ख़ाने में
मीराजी
ग़ज़ल
शकील बदायूनी
ग़ज़ल
'सय्यद' जी क्या बीती तुम पर खोए खोए रहते हो
कुछ तो दिल की बात बताओ कुछ अपने अहवाल कहो
सय्यद शकील दस्नवी
ग़ज़ल
इन दिनों इश्क़ की फ़ुर्सत ही नहीं है वर्ना
उस दरीचे की उदासी तो बुलाती है मुझे
कफ़ील आज़र अमरोहवी
ग़ज़ल
कुछ अपनी गुज़री ही 'बेदम' भली मालूम होती है
मिरी बीती सुना दे क़िस्सा-ए-फ़रहाद रहने दे