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ग़ज़ल
चराग़-ए-दाग़ दिल-ए-सोख़्ता जो हो रौशन
पतंग फिर कहीं आँखों को सेंकता न फिरे
मीर शम्सुद्दीन फ़ैज़
ग़ज़ल
बुझ गया मेरा चराग़-ए-दाग़ वस्ल-ए-यार में
नूर-ए-मह नज़दीकी-ए-ख़ुर्शेद से ज़ाइल हुआ
इमाम बख़्श नासिख़
ग़ज़ल
हमारी मा'सूमियत तो देखो रख आए दिल हम हुज़ूर-ए-जानाँ
कि जैसे कोई ख़ुदा का बंदा हवा के आगे चराग़ रख दे