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ग़ज़ल
अकबर इलाहाबादी
ग़ज़ल
कहे सौ शेर तुम ने सुस्त तो हासिल 'हफ़ीज़' इस का
ग़ज़ल हो चुस्त छोटी सी तो बैतों की कमी अच्छी
हफ़ीज़ जौनपुरी
ग़ज़ल
बाँधी ज़ाहिद ने तवक्कुल पर कमर सौ बार चुस्त
लेकिन आख़िर बाइस-ए-सुस्ती-ए-हिम्मत खुल गई
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
अहमद नदीम क़ासमी
ग़ज़ल
चुस्त कमर का क्या सबब तंग क़बा की वज्ह क्या
हम तो हैं आप सर-ब-कफ़ हम से अदा की वज्ह क्या
शाद अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
वो कि ठुकराते हैं मा'सूम फ़रिश्तों का लिबास
अपने शैतान से इक चुस्त क़बा चाहते हैं