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ग़ज़ल
लिखा ये दावर-ए-महशर ने मेरी फ़र्द-ए-'इस्याँ पर
ये वो बंदा है जिस पर नाज़ करता है करम मेरा
चकबस्त बृज नारायण
ग़ज़ल
ख़त्म होगा न कभी सिलसिला-ए-अहल-ए-वफ़ा
सोच ऐ दावर-ए-मक़्तल ये फ़ज़ा क्यूँ चुप है
उबैदुल्लाह अलीम
ग़ज़ल
क्या ही अफ़्शाँ है जबीन ओ अबरू-ए-ख़मदार पर
है चराग़ाँ आज का'बे के दर ओ दीवार पर
गोया फ़क़ीर मोहम्मद
ग़ज़ल
तरफ़-दारी न कर इंसाफ़ कर ऐ दावर-ए-महशर
सज़ा दे इन बुतों को वर्ना हम फ़रियाद करते हैं