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ग़ज़ल
इस क़दर ज़ोफ़ में आवाज़ निकलती तो कहाँ
हम से ज़ंजीर-ए-दर-ए-यार हिलाई न गई
ज़ैनुल आब्दीन ख़ाँ आरिफ़
ग़ज़ल
न सुन्ना तो हूर ओ क़ुसूर की ये हिकायतें मुझे वा'इज़ा
कोई बात कर दर-ए-यार की दर-ए-यार ही से तो काम है
जिगर मुरादाबादी
ग़ज़ल
बिस्मिल चलेंगे आज दर-ए-यार तक ज़रूर
पज़मुर्दा दिल को तेरे गुल-ए-तर बनाएँगे