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ग़ज़ल
ये दिल ये पागल दिल मिरा क्यूँ बुझ गया आवारगी
इस दश्त में इक शहर था वो क्या हुआ आवारगी
मोहसिन नक़वी
ग़ज़ल
रहा करते हैं क़ैद-ए-होश में ऐ वाए-नाकामी
वो दश्त-ए-ख़ुद-फ़रामोशी के चक्कर याद आते हैं
हसरत मोहानी
ग़ज़ल
जौन एलिया
ग़ज़ल
तुम ने देखी ही नहीं दश्त-ए-वफ़ा की तस्वीर
नोक-ए-हर-ख़ार पे इक क़तरा-ए-ख़ूँ है यूँ है
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
दश्त-ए-नज्द-ए-यास में दीवानगी हो हर तरफ़
हर तरफ़ महमिल का शक हो पर कहीं महमिल न हो