आपकी खोज से संबंधित
परिणाम "dasht-e-yaar"
ग़ज़ल के संबंधित परिणाम "dasht-e-yaar"
ग़ज़ल
वो ग़ज़ल का रूप लिए हुए मुझे हर मक़ाम पे ले गया
कभी दश्त-ए-यार के दरमियाँ कभी शहर-ए-फ़िक्र के पास भी
हसन नईम
ग़ज़ल
सारे दिन करते हैं हम दश्त-ए-तमन्ना का सफ़र
गर्द चेहरे पे लिए शाम को घर आते हैं
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
जल गया धूप में यादों का ख़ुनुक साया भी
बे-नवा दश्त-ए-बला में कोई हम सा भी नहीं
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
है ज़िक्र-ए-यार क्यूँ शब-ए-ज़िंदाँ से दूर दूर
ऐ हम-नशीं ये तर्ज़ ग़ज़ल का कभी न था