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ग़ज़ल
ज़माना आया है बे-हिजाबी का आम दीदार-ए-यार होगा
सुकूत था पर्दा-दार जिस का वो राज़ अब आश्कार होगा
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
बुझती नहीं है तिश्नगी दीदार-ए-यार की
नज़रों से उन के लाख पिलाने के बअ'द भी
अशहद बिलाल इब्न-ए-चमन
ग़ज़ल
किनारा ख़्वाब को है चश्म-ए-तर से आशिक़ के
ख़याल-ए-जल्वा-ए-दीदार-ए-यार कैसे हो