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ग़ज़ल
दिल-ए-मुज़्तर में जलती एक हसरत और रखनी है
मुझे ताक़-ए-जुनूँ में इक मोहब्बत और रखनी है
सज्जाद हैदर
ग़ज़ल
पंडित अक्स लखनवी
ग़ज़ल
दिल-ए-मुज़्तर तिरी फ़ुर्क़त में बहलाया नहीं जाता
किसी पहलू से ये नादान समझाया नहीं जाता
जमीला ख़ातून तस्नीम
ग़ज़ल
ठहर जावेद के अरमाँ दिल-ए-मुज़्तर निकलते हैं
खड़े हैं मुंतज़िर हम घर से वो बाहर निकलते हैं
रशीद लखनवी
ग़ज़ल
ईजाद ग़म हुआ दिल-ए-मुज़्तर के वास्ते
पैदा जुनूँ हुआ है मिरे सर के वास्ते
मुंशी देबी प्रसाद सहर बदायुनी
ग़ज़ल
दिल-ए-मुज़्तर से उल्फ़त की फ़रावानी नहीं जाती
नहीं जाती है या'नी ख़ू-ए-इंसानी नहीं जाती
निशात किशतवाडी
ग़ज़ल
तड़पा किया जो ये दिल-ए-मुज़्तर तमाम रात
काटी है मैं ने क्या कहूँ क्यूँकर तमाम रात