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ग़ज़ल
दिल की बातें नहीं है तो दिलचस्प ही कुछ बातें हों
ज़िंदा रहना है तो दिल को बहलाना तो होगा
जावेद अख़्तर
ग़ज़ल
दास्तान-ए-ज़िंदगी भी किस क़दर दिलचस्प है
जो अज़ल से छिड़ गया है उस फ़साने की कहो
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
साया करते हैं हुमा उड़ के परों से अपने
तेरे रुख़्सार से दिलचस्प हो अन्क़ा है वो रुख़
हैदर अली आतिश
ग़ज़ल
किताब-ए-दहर का दिलचस्प टुकड़ा है मिरी हस्ती
मुझे देखो कि बैठा हूँ मुजस्सम दास्ताँ हो कर
हफ़ीज़ जालंधरी
ग़ज़ल
दोस्त-दारी का ये पैराया भी क्या दिलचस्प है
ले रहे हैं सामने मेरे वो बेगाने का नाम