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ग़ज़ल
ग़ाज़ा ब-रू मिसी ब-लब पान ब-दहन हिना ब-कफ़
सिल्क-ए-दुर्र-ए-अदन बसर तुर्रा-ए-अम्बरीं ब-दोश
अब्दुल रहमान एहसान देहलवी
ग़ज़ल
क़तरों में अरक़ के है अयाँ रंग बदन का
देखा न गया आज तलक दुर्र-ए-अदन सुर्ख़
मुंशी देबी प्रसाद सहर बदायुनी
ग़ज़ल
ग़ज़ल वो क्यूँ न हो 'फ़ारिग़' दुर-ए-अदन कि जहाँ
हर एक शे'र को ज़िद हो कि शाह-पारा बनूँ
फ़ारिग़ बुख़ारी
ग़ज़ल
क़नाअ'त करती रहती है जो सीपी अब्र-ए-नैसाँ पर
बसर दुर्र-ए-'अदन की आबरू से होती रहती है
उफ़ुक़ लखनवी
ग़ज़ल
दस्तरस आसाँ नहीं कुछ ख़िर्मन-ए-मअ'नी तलक
जो भी आएगा वो लफ़्ज़ों के गुहर ले जाएगा
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
दयार-ए-दूर में मैं तो नहीं आता हूँ याद उन को
न जाने वो मुझे फिर क्यों बराबर याद आते हैं
ए. डी. अज़हर
ग़ज़ल
है ज़िक्र-ए-यार क्यूँ शब-ए-ज़िंदाँ से दूर दूर
ऐ हम-नशीं ये तर्ज़ ग़ज़ल का कभी न था