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ग़ज़ल
मिलता है क़ैद-ए-ग़म में भी लुत्फ़-ए-फ़ज़ा-ए-बाग़
चाक-ए-क़फ़स से आती है फ़रफ़र हवा-ए-बाग़
असद अली ख़ान क़लक़
ग़ज़ल
न तन में ख़ून फ़राहम न अश्क आँखों में
नमाज़-ए-शौक़ तो वाजिब है बे-वुज़ू ही सही
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
तुम्हें उस से मोहब्बत है तो हिम्मत क्यूँ नहीं करते
किसी दिन उस के दर पे रक़्स-ए-वहशत क्यूँ नहीं करते
फ़रहत एहसास
ग़ज़ल
तू ने देखा है कभी एक नज़र शाम के बा'द
कितने चुप-चाप से लगते हैं शजर शाम के बा'द