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ग़ज़ल
वो ऐसा तस्वीर-नवाज़ कि जिस को मैं जंचता ही नहीं
और इक मैं हर फ़्रेम के अंदर चित्र उसी का जड़ बैठा
नवीन सी. चतुर्वेदी
ग़ज़ल
शकील बदायूनी
ग़ज़ल
आह ये मजमा-ए-अहबाब ये बज़्म-ए-ख़ामोश
आज महफ़िल में 'फ़िराक़'-ए-सुख़न-आरा भी नहीं