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ग़ज़ल
लीडरी चाहो तो लफ़्ज़-ए-क़ौम है मेहमाँ-नवाज़
गप-नवीसों को और अहल-ए-मेज़ को राज़ी करो
अकबर इलाहाबादी
ग़ज़ल
है जिंस परी सा कुछ आदम तो नहीं असलन
इक आग लगा दी है उस अमर्द-ए-ख़ुश-गप ने
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
ग़ज़ल
मिलना-जुलना गप्प ठहाके पल पल अपने साथ चले
आख़िरी शब सब छूट गए बस इक साथी था सन्नाटा
संजय कुमार कुन्दन
ग़ज़ल
ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो
नश्शा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
मगर लिखवाए कोई उस को ख़त तो हम से लिखवाए
हुई सुब्ह और घर से कान पर रख कर क़लम निकले