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ग़ज़ल
मज़ा क्या ख़िज़्र की सूरत जो उम्र-ए-जावेदानी हो
हम उस जीने से बाज़ आए जो तन्हा ज़िंदगानी हो
वफ़ा लखनवी
ग़ज़ल
सारे ख़ाके उस के ख़ाके सारा मंज़र उस का है
अपना मुक़द्दर क़तरा-ए-शबनम और समुंदर उस का है
वफ़ा हिजाज़ी
ग़ज़ल
ढंग से चलना ज़मीं पर आज तक आया नहीं
गो ख़ला में मुर्तसिम हम नक़्श-ए-पा करने लगे