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ग़ज़ल
तय हुआ नज़्म ही मुस्तक़बिल है पान-सौ बिल है भई प्यारो
आँख न मारो ग़ज़ल हमारे हसब-नसब का हिस्सा है
इदरीस बाबर
ग़ज़ल
ये 'जमाल' मय-कदा है नहीं याँ कोई तकल्लुफ़
ओ अरब अजम के झगड़े न हसब नसब न ज़ातें
मसूद अख़्तर जमाल
ग़ज़ल
दौलत और शोहरत लोगों ने क़िस्मत से आगे पाई
और मुसीबत भी हम को तो बस हस्ब-ए-औक़ात मिली