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ग़ज़ल
जिगर मुरादाबादी
ग़ज़ल
गिरफ़्त पंजा-ए-फ़ना में ख़स्ता-हाल-ओ-ख़ूँ-चकाँ
हयात-ए-मुस्तआर है ज़मीं से आसमान तक
राग़िब मुरादाबादी
ग़ज़ल
सुनता है कामनटरी हीरो रेडियो रख कर कानों पर
बॉलिंग बैटिंग चौव्वा छक्का ये मालूम न वो मालूम
पागल आदिलाबादी
ग़ज़ल
क्यूँ फ़िक्र हाल-ओ-माज़ी की करता है रोज़-ओ-शब
सब उस को इख़्तियार है बे-इख़्तियार तू
बबल्स होरा सबा
ग़ज़ल
मैं अपने हाल-ओ-माज़ी पर भी कुछ ऐ 'अर्श' रो लेता
मगर पेश-ए-नज़र इस वक़्त मुस्तक़बिल की बातें हैं
अर्श मलसियानी
ग़ज़ल
मिज़ाज-ए-यार की सूरत ज़माना रुख़ बदलता है
कभी माज़ी से मेरा हाल-ओ-मुस्तक़बिल नहीं मिलता