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ग़ज़ल
बू-ए-गुल 'आतिश' कहीं होती है महसूस-ए-नज़र
इफ़्तिरा है रोज़-ए-महशर यार के दीदार का
हैदर अली आतिश
ग़ज़ल
सोज़-ए-जिगर से होंट पे तबख़ाला इफ़्तिरा
शोर-ए-फ़ुग़ाँ से जुंबिश-ए-दीवार-ओ-दर ग़लत
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
ग़ज़ल
इज़हार-ए-इश्क़ डोल ही अपना नहीं है शोख़
जिन ने कहा ये तुझ से है महज़ इफ़्तिरा ग़लत
क़ाएम चाँदपुरी
ग़ज़ल
इफ़्तिरा-ओ-मक्र से शायद तुझे मिलता वक़ार
हक़-परस्ती ने तुझे ऐ 'कैफ़' रुस्वा कर दिया
सरस्वती सरन कैफ़
ग़ज़ल
नसीम देहलवी
ग़ज़ल
तुम्हें नाज़ हो न क्यूँकर कि लिया है 'दाग़' का दिल
ये रक़म न हाथ लगती न ये इफ़्तिख़ार होता
दाग़ देहलवी
ग़ज़ल
तू नहीं तो ज़िंदगी में और क्या रह जाएगा
दूर तक तन्हाइयों का सिलसिला रह जाएगा