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ग़ज़ल
इल्म-ओ-हुनर है मुल्क को दरकार आज-कल
हम ख़ुद भले-बुरे के हैं मुख़्तार आज-कल
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
जिस्म की नश्व-ओ-नुमा सूरत-ए-अशिया-ए-ज़मीं
रू-ए-ख़ूबाँ फ़लकिय्यतत में आ जाता है
मोहम्मद आबिद अली आबिद
ग़ज़ल
ख़ुदा जाने ये इल्म-ए-हैअत-ए-अश्या कहाँ ठहरे
जिसे उंसुर सा समझा था मुरक्कब सा निकल आया
इमरान शमशाद नरमी
ग़ज़ल
इल्म-ओ-जाह-ओ-ज़ोर-ओ-ज़र कुछ भी न देखा जाए है
बज़्म-ए-साक़ी में दिलों का ज़र्फ़ जाँचा जाए है