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ग़ज़ल
है शिकस्त-ए-बे-सुतूँ मेआ'र-ए-इस्तेदाद-ए-इश्क़
कोहकन का नाम फ़र्द-ए-जौहर-ए-क़ाबिल में है
शोला करारवी
ग़ज़ल
बस अब तो मुंजमिद ज़ेहनों की 'यावर' बर्फ़ पिघले
कहाँ तक अपनी इस्तेदाद के जौहर निकालूँ
याक़ूब यावर
ग़ज़ल
वहाँ जब हस्ब-ए-इस्ते'दाद है इन'आम की बारिश
नहीं फिर क्यों निगाह-ए-लुत्फ़ हो जाती है दुश्मन पर
आरिफ़ नदवी
ग़ज़ल
रेख़्ते के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो 'ग़ालिब'
कहते हैं अगले ज़माने में कोई 'मीर' भी था
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
मेरा क्या इक मौज-ए-हवा हूँ पर यूँ है ऐ ग़ुंचा-दहन
तू ने दिल का बाग़ जो छोड़ा ग़ुंचे बे-उस्ताद हुए
जौन एलिया
ग़ज़ल
अदब ता'लीम का जौहर है ज़ेवर है जवानी का
वही शागिर्द हैं जो ख़िदमत-ए-उस्ताद करते हैं