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ग़ज़ल
है शब-ए-वस्ल मय-ए-वस्ल पियो तुम बे-ख़ौफ़
आँख क्यों आप की है जानिब-ए-दर कुछ भी नहीं
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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है शब-ए-वस्ल मय-ए-वस्ल पियो तुम बे-ख़ौफ़
आँख क्यों आप की है जानिब-ए-दर कुछ भी नहीं