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ग़ज़ल
मैं जुम्बिश-ए-लब देख के समझा सुख़न-ए-मौज
पुर-वस्फ़ तबस्सुम से तिरे है दहन-ए-मौज
करामत अली शहीदी
ग़ज़ल
मेरी हस्ती भी तिरे जल्वों में गुम होती गई
तेरा जल्वा भी फ़रोग़-ए-ला-मकाँ बनता गया
जुंबिश ख़ैराबादी
ग़ज़ल
यूँ काकुल-ओ-रुख़ अपने तसव्वुर में हैं 'जुम्बिश'
इक मरहला-ए-शाम-ओ-सहर देख रहा हूँ
जुंबिश ख़ैराबादी
ग़ज़ल
क़यामत में लबों पर शिकवा-हा-ए-पुर-जफ़ा ला कर
तिरी मासूम फ़ितरत को पशेमाँ कौन देखेगा
जुंबिश ख़ैराबादी
ग़ज़ल
धुआँ जो बे-कसों की आह का उट्ठा तो ऐ 'जुम्बिश'
चमन वाले पुकार उट्ठे कि वो अब्र-ए-बहार आया
जुंबिश ख़ैराबादी
ग़ज़ल
बेदर्दों के दौर में 'जुम्बिश' ख़ून-ए-तमन्ना होने दो
कोई न कोई आँसू सुर्ख़ी दे देगा अफ़्साने की
जुंबिश ख़ैराबादी
ग़ज़ल
जो रंग-ए-हुस्न-ए-ख़ामोशी है वो खोती है गोयाई
हुआ जब लब-कुशा ग़ुंचा तो बाहर बू निकल आई
जुंबिश ख़ैराबादी
ग़ज़ल
अभी ऐ दास्ताँ-गो दास्ताँ कहता चला जा
अभी हम जागते हैं जुम्बिश-ए-लब देखते हैं