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ग़ज़ल
इस फ़िक्र-ए-रोज़गार में सब खप गया दिमाग़
अब शा'इरी को चाहिए इक दूसरा दिमाग़
बासिर सुल्तान काज़मी
ग़ज़ल
रह वादी-ए-ऐमन की लेता हूँ कि घबराया
इस दिल की बदौलत याँ मुझ को तरफ़-ए-चप ने
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
ग़ज़ल
विक्रम
ग़ज़ल
निबाह लेते ज़माने से हम भी मर-खप कर
जो आप 'असर' के दिल में न राह कर लेते
मोहम्मद नक़ी रिज़वी असर
ग़ज़ल
भरम खुल जाए ज़ालिम तेरे क़ामत की दराज़ी का
अगर इस तुर्रा-ए-पुर-पेच-ओ-ख़म का पेच-ओ-ख़म निकले