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ग़ज़ल
शफ़क़ फूली हुई है हर तरफ़ ख़ून-ए-शहीदाँ की
ज़मीन-ए-कू-ए-क़ातिल आसमाँ मालूम होती है
अख़तर मधुपुरी
ग़ज़ल
कू-ए-क़ातिल में बुलावा है ब-सद-शान चलो
आज ज़ख़्मों से बदन अपना सजा लो यारो
अब्दुल मजीद ख़ाँ मजीद
ग़ज़ल
सरख़ुशी में यूँही दिल-शाद ओ ग़ज़ल-ख़्वाँ गुज़रे
कू-ए-क़ातिल से कभी कूचा-ए-दिलदार से हम
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
शफ़क़ कह ले कोई चाहे शफ़क़-गूँ आसमाँ कह ले
हमें तो कू-ए-क़ातिल की ज़मीं मा'लूम होती है
रियाज़ ख़ैराबादी
ग़ज़ल
मसाम-ए-संग से उस दम पसीने ख़ूँ के चलते हैं
कफ़न-बर्दोश जब हम कू-ए-क़ातिल में निकलते हैं
बदीउज़्ज़माँ सहर
ग़ज़ल
हुए हैं पाँव ज़ख़्मी होशियार अब ऐ दिल-ए-नादाँ
मुझे ये कू-ए-क़ातिल की ज़मीं मालूम होती है