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ग़ज़ल
क्यूँ मिटो नक़्श-ए-क़दम साँ किसी रफ़्तार पे तुम
बैठे बिठलाए ग़रज़ क्या है कि इक हश्र उठाओ
दत्तात्रिया कैफ़ी
ग़ज़ल
बुलंदी पर उन्हें मिट्टी की ख़ुश्बू तक नहीं आती
ये वो शाख़ें हैं जिन को अब शजर अच्छा नहीं लगता
जावेद अख़्तर
ग़ज़ल
अब न अगले वलवले हैं और न वो अरमाँ की भीड़
सिर्फ़ मिट जाने की इक हसरत दिल-ए-'बिस्मिल' में है