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ग़ज़ल
तुझ से मुक़ाबले की किसे ताब है वले
मेरा लहू भी ख़ूब है तेरी हिना के ब'अद
मौलाना मोहम्मद अली जौहर
ग़ज़ल
न रहती यूसुफ़-ए-कनआँ' की गर्मी-ए-बाज़ार
मुक़ाबले में जो हम तुझ को रू-ब-रू करते
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
ग़ज़ल
हज़ार तरह के अफ़्कार दिल को रौंद रहे हैं
मुक़ाबले में तिरे रंज-ए-रोज़गार है आ जा
जमीलुद्दीन आली
ग़ज़ल
बहुत सी आँखें लगीं हैं और एक ख़्वाब तय्यार हो रहा है
हक़ीक़तों से मुक़ाबले का निसाब तय्यार हो रहा है