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ग़ज़ल
मैं तुझ को पा कर ही मुतमइन हूँ अब और कोई तलब नहीं है
जो आज तक था नसीब से वो मुतालबा ख़त्म हो गया है
महशर आफ़रीदी
ग़ज़ल
ये नवाज़िश-ए-जुनूँ है कि फ़ुसूँ तिरी नज़र का
ये मुतालबा है दिल का अभी और फ़रेब खाएँ
मुस्लिम शमीम
ग़ज़ल
वो तिरी ग़िना का मुतालबा कि फ़राख़ दस्त-ए-अता रहे
ये तिरी अना का मोआ'मला न दराज़ दस्त-ए-सवाल कर
अतहर ज़ियाई
ग़ज़ल
नमाज़ तो है फ़रीज़ा-ए-रब नमाज़ पढ़ कर दुआ न माँगो
दुआ ख़ुदा से मुतालबा है मुतालबा इल्तिजा नहीं है