aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "paa-e-daaG"
वो भूल सकता है ऐ 'दाग़' मुझ को जल्द मगरउसे भुलाने में शायद मुझे ज़माना लगे
बुनियाद तुझ से ज़ुल्म-ओ-सितम की पड़ी मगरमेह्र-ओ-वफ़ा से 'दाग़' तू अंजान है अभी
तोड़ दे जो क़फ़स की सभी तीलियाँमुझ को वो क़ुव्वत-ए-बाल-ओ-पर चाहिए
अज़्मत-ए-ख़ाक-ए-वतन पर न कहीं हर्फ़ आएहै वतन ख़तरे में अब होश में आओ यारो
ढा रहा है जो 'दाग़' ज़ुल्म-ओ-सितमएक दिन वो भी मेहरबाँ होगा
शाख़-ए-शजर पे होती तो कुछ और बात थीमौजों पे आशियाने की ता'मीर किस लिए
शब-ए-वस्ल भी लब पे आए गए हैंये नाले बहुत मुँह लगाए गए हैं
लोग कहते हैं बना दिल्ली बिगड़ कर लखनऊपर कहाँ ऐ 'दाग़' इस उजड़े हुए घर का जवाब
ऐ आरज़ू-ए-ताज़ा न कर मुझ से छेड़-छाड़मैं पा-ए-शौक़-ओ-दस्त-ए-तमन्ना-बुरीदा हूँ
ज़ीस्त से तंग हो ऐ 'दाग़' तो जीते क्यूँ होजान प्यारी भी नहीं जान से जाते भी नहीं
दिल में घुट घुट के रह गई हसरतलब पर आ आ के रह गया मतलब
खोटे दामों में ये भी क्या ठहरादिरहम-ए-'दाग़' का रिवाज नहीं
करेंगे सिफ़ारिश हम ऐ 'दाग़' उन सेअगर ज़िक्र आया दोबारा तुम्हारा
नहीं खेल ऐ 'दाग़' यारों से कह दोकि आती है उर्दू ज़बाँ आते आते
दुश्मन-ए-जाँ हैं बहुत पर ऐ इश्क़तुझे जाना तुझे माना दुश्मन
दिया दिल तो ऐ 'दाग़' अंदेशा क्यागुज़रनी जो होगी गुज़र जाएगी
मशहूर हैं सिकंदर ओ जम की निशानियाँऐ 'दाग़' छोड़ जाएँगे हम यादगार दिल
ग़ज़ल इक और भी ऐ 'दाग़' लिक्खोतबीअत इस ज़मीं में कुछ लड़ी है
पहले ऐ 'दाग़' कुछ न होश आयादिल की अब रोक-थाम होती है
बा'द मुद्दत के ये ऐ 'दाग़' समझ में आयावही दाना है कहा जिस ने न माना दिल का
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