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ग़ज़ल
उम्र आख़िर है जुनूँ कर लूँ बहाराँ फिर कहाँ
हाथ मत पकड़ो मिरा यारो गिरेबाँ फिर कहाँ
इनामुल्लाह ख़ाँ यक़ीन
ग़ज़ल
हमारा दिल दुखाना कुछ हँसी या खेल समझे हो
समझ पकड़ो जवाँ हो अब न जाओ तुम लड़कपन पर