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ग़ज़ल
शौक़ तिरा है मौजज़न ज़ौक़ तिरा बहाना-जू
खोल न दें भरम कहीं परद ज्ञान राज़ का
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
ग़ज़ल
शकील बदायूनी
ग़ज़ल
'क़तील' अपना मुक़द्दर ग़म से बेगाना अगर होता
तो फिर अपने पराए हम से पहचाने कहाँ जाते
क़तील शिफ़ाई
ग़ज़ल
समझते ही नहीं नादान कै दिन की है मिल्किय्यत
पराए खेतों पे अपनों में झगड़ा होने लगता है