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ग़ज़ल
ज़मीर-ए-वक़्त में पैवस्त हूँ मैं फाँस की सूरत
ज़माना क्या समझता है कि आसानी से निकलूँगा
ज़फ़र गोरखपुरी
ग़ज़ल
देखो कि फँस न जाएँ फ़रिश्ते भी जाल में
क्यूँ पढ़ रहे हो खोल के ज़ुल्फ़-ए-रसा नमाज़
अहमद हुसैन माइल
ग़ज़ल
न जब तक चाक हो दिल फाँस कब दिल की निकलती है
जहाँ हो काम ख़ंजर का वहाँ सूई से क्या हासिल
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
क्यूँकर शिकार-ए-हुस्न न खेलें यहाँ के लोग
परियों को फाँस लेते हैं हिन्दोस्ताँ के लोग
मुनीर शिकोहाबादी
ग़ज़ल
दिल फँस गया है आप की ज़ुल्फ़ों में हमारा
हैं बंदा-ए-बे-दाम तुम्हारे कई दिन से