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ग़ज़ल
दरिया के किनारे तो पहुँच जाते हैं प्यासे
प्यासों के घरों तक कोई दरिया नहीं जाता
मुज़फ़्फ़र वारसी
ग़ज़ल
मंदिर गए मस्जिद गए पीरों फ़क़ीरों से मिले
इक उस को पाने के लिए क्या क्या किया क्या क्या हुआ
बशीर बद्र
ग़ज़ल
पैरों को तो दश्त भी कम है सर को दश्त-नवर्दी भी
'आदिल' हम से चादर जितनी फैल सकी फैला ली है
ज़ुल्फ़िक़ार आदिल
ग़ज़ल
आख़िरी दौर में भी तुझ को क़सम है साक़ी
भर के इक जाम न प्यासों को पिलाना हरगिज़