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ग़ज़ल
फ़िक्र-ए-दोज़ख़ में हमें रफ़अ'-मआ'सी की पड़ी
आग पर दामन-ए-तर को हैं सुखाते जाते
सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम
ग़ज़ल
तब रफ़अ' ख़लिश होए मियाँ दिल से 'मुहिब' के
कहते हैं सो तुझ से कहे दिल खोल के दुख बाट
वलीउल्लाह मुहिब
ग़ज़ल
क़त्अ-ए-वफ़ा से रफ़अ'-ए-शिकायत मुहाल है
हाँ सिलसिला है नाला-ए-दिल पेच-ओ-ताब का
मोहम्मद ज़करिय्या ख़ान
ग़ज़ल
कुछ तो हवा भी सर्द थी कुछ था तिरा ख़याल भी
दिल को ख़ुशी के साथ साथ होता रहा मलाल भी
परवीन शाकिर
ग़ज़ल
यूँही बे-सबब न फिरा करो कोई शाम घर में रहा करो
वो ग़ज़ल की सच्ची किताब है उसे चुपके चुपके पढ़ा करो