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ग़ज़ल
मुझ को ये होश ही न था तू मिरे बाज़ुओं में है
या'नी तुझे अभी तलक मैं ने रिहा नहीं किया
जौन एलिया
ग़ज़ल
तरसती है निगाह-ए-ना-रसा जिस के नज़ारे को
वो रौनक़ अंजुमन की है उन्ही ख़ल्वत-गज़ीनों में
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
अजब ये ज़िंदगी की क़ैद है दुनिया का हर इंसाँ
रिहाई माँगता है और रिहा होने से डरता है
राजेश रेड्डी
ग़ज़ल
'रसा' गर जाम-ए-मय ग़ैरों को देते हो तो मुझ को भी
नशीली आँख दिखला कर करो सरशार होली में