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ग़ज़ल
बे-रोए मिस्ल-ए-अब्र न निकला ग़ुबार-ए-दिल
कहते थे उन को बर्क़-ए-तबस्सुम हँसी से हम
मोमिन ख़ाँ मोमिन
ग़ज़ल
मिल कर रोएँ फ़रियाद करें उन बीते दिनों को याद करें
ऐ काश कहीं मिल जाए कोई जो मीत पुराना बचपन का
आनंद बख़्शी
ग़ज़ल
जिस्म तो मिट्टी में मिलता है यहीं मरने के बाद
उस को क्या रोएँ जो मरता ही नहीं मरने के बाद
गणेश बिहारी तर्ज़
ग़ज़ल
ग़ुंचे रोएँ कलियाँ रोएँ रो रो अपनी आँखें खोएँ
चैन से लम्बी तान के सोएँ इस फुलवारी के रखवाले